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| अनुसंधानशाला से विचार भाग 13 प्रस्तुत करते इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद कोटेशन ** मन की गति ( Velocity of mind) ** विषम परिस्थितियों में भी संयम और धैर्य बनाए रखना योग्य पुरुष के लक्षण होते। और यही सफलता का रास्ता भी है। ** ** ईश्वर को पेट नहीं होता । इसलिए उसे भोजन की आवश्यकता नहीं होती है। प्रसाद तो भक्त गण अपने लिए चढ़ाते हैं। अगर ईश्वर खाने लगे तो कोई भी प्रसाद नहीं चढ़ाएगा। सभी उसे पेटु कहेंगे। ** जो सहायक दोस्त और दुश्मन दोनों में भी बैठे उस पर विश्वास करना धोखा खाना है। वह विश्वासनीय नहीं है। ** ** गुणा और जोड़ की लगातार क्रियाएं का अंत अनंत है। तथा घटाव और भाग का शून्य। शून्य आरंभ है और अनंत अंत। अतः घटाव और भाग आरंभ की ओर ले जाते जबकि जोड़ और गुणा अनंत की ओर। ** नाम, यश और धन ही नाम, यश और धन लाते और इन्हें पाने के लिए कठिन संघर्ष करना पड़ता है। ** ** चारो तरफ विष्ठा हो और जाने का रास्ता नहीं तो मजबूरी में विष्ठा का रास्ता ही चुनना पड़ेगा। ** अगर संसार चोर हो जाए और एक साधु हो तो उसे क्या करना चाहिए ? ** मनुष्य को बिना कर्म नहीं बैठना चाहिए। कुछ न कुछ करते रहना चाहिए , रंग बदल कर, ढंग बदल कर, संग बदल कर। ** ** अगर लंबाई घटाई जाए और चौड़ाई बढ़ाई जाए तो एक समय ऐसा आएगा कि लंबाई और चौड़ाई बराबर हो जाएगी। विकास-विनाश और लाभ-हानि इत्यादि की भी यही स्थिति है। ** ** प्रारब्ध ईश्वरीय है और कर्म मानव निर्मित। कर्म अपने अंतर्गत आता , प्रारब्ध अधिकार से बाहर। अतः प्रारब्ध से अच्छा है कर्म पर विश्वास करना। ** ** खुशी दो तरह से होती। एक निर्धारित कार्य की समाप्ति पर तथा दूसरा सफल फल प्राप्ति पर। ** ** सांप हर जगह ( बिल से बाहर ) टेढ़ा चलता है, परंतु बिल में बिल के जैसा। यदि बिल सीधा हो तो उसे सीधा चलना पड़ेगा नहीं तो उसकी कमर टूट जाएगी। बिल सांप का रक्षक है और उससे ज्यादा शक्तिशाली। ** जब कोई अपना अस्तित्व खोता है तब ही वह दूसरा में बदलता है। ** ** जैसे जैसे सूक्ष्मता की ओर वस्तु बढ़ती जाती है अपना गुण खोती चली जाती है। जैसे सभी तत्व का इलेक्ट्रॉन एक ही गुण का होता है, इसमें पदार्थ का गुण नहीं होता है। ** पांच ज्ञानेंद्रियां मन बनाते हैं। और मन विचार बनाता है। इन पांचों में आंख सबसे प्रधान है। इसके बाद कान , स्पर्श , स्वाद और गंध है। ** ** मनुष्य का प्रभाव दो तरह से होता है। प्रथम रूप द्वारा तथा दूसरा गुण द्वारा। ** किसी देश में प्रत्येक व्यक्ति की आस्था और शक्ति का कुल योग वहां की सरकार का मापदंड है।** ** जैसे मल्लाह जाल से मछली छापता है वैसे ही ज्ञानी प्रकृति से ज्ञान पकड़ विचार बनाते हैं।** ** मनुष्य खुश होने पर हंसता है और दुखी होने पर रोता है। इन दोनों अवस्थाओं के बाद सामान्य होता है। ए दोनो अतरिक्त मनोभाव को बाहर कर सामान्य बनाते हैं जैसे डैम का स्पिल वे (spill way ) डैम से पानी बाहर निकल डैम को सामान्य बनाता है। ** ** भेष और परिवेश ही विशेष बनाता है। इसलिए मनुष्य को दोनों पर ध्यान देना चाहिए। ** ** तम भार में शून्य तथा आयतन में अनंत है। दूसरे शब्दों में इसका विस्तार अनंत और तौल शून्य है। देखने में अनंत और अनुभव करने में शून्य है।** ** पेट की सामग्री सस्ती होती है और मन की महंगी। पेट की सामग्री कुदाल देता और मन की कलम। ** ** सहयोग तीन तरह से किया जाता है , तन से , मन से और धन से। ** ** बच्चे खिलौने से खेलते और सयाने बच्चों से। अतः बच्चे सयानों के लिए खिलौना हैं जो मन को प्रसन्न करते हैं। ** ** कलह और दुख से हमेशा नाश होता है। तथा शांति और सुख से हमेशा विकास।** ** पानी का कोई रंग नहीं होता है। इसका रंग अदृश्य है। यह जिस पात्र में रहता है उसी के रंग के कारण दिखलाई पड़ता है।** ** प्याज के सभी परत निकाल देने पर जो बचता है वह शून्य है। जहां पर रूक जाएं वहीं प्याज का अस्तित्व है। अंतिम परत शून्य है, यहां उसका अस्तित्व नहीं रहता है। यह शून्य का सबसे बढ़िया उदाहरण है।** ** सभी पीला सोना नहीं होता है। पखाना भी पीला होता है।** ** अगर पखाना और मूत्र ही खाना पड़े तो सज्ञ और विज्ञ गाय के खाते हैं जैसे पंचगभ और पंचामृत।** ** जैसे कुम्हार का घड़ा शुरू में कच्चा रहता है, वह जरा सा झटका नहीं सह सकता है। और जिसे वह पीटकर, सुखाकर , रंग कर, तथा अंत में आग में जला कर पक्का बनाता है वैसे ही पिता अपनी संतान को विभिन्न अवस्थाओं और क्रियाओं से गुजार कर पक्का और योग्य बनाता है। ** ** प्रत्येक नाम अपने आप में एक छोटा इतिहास छुपाए हुए है।** ** सोचने में सबसे कम, देखने में उससे ज्यादा , सुनने और बोलने में उससे ज्यादा, और लिखने में सबसे ज्यादा समय लगता है। ** ** प्रकृति हमेशा अपना संतुलन बनाए रखती है। इसलिए वह जितना ऋणात्मक होगी उतना ही घनात्मक । दूसरे शब्दों में एक जगह अगर ऋणात्मक होगी तो दूसरे जगह घनात्मक तभी संतुलन में रहेगी। ************ क्रमशः ***************** इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद My blog URL ************* ***** ************* |
मैं इंजीनियर , रिसर्चर और लेखक हूं। मैं गांव रोआरी , जिला-पश्चिम चम्पारण ,बिहार ,भारत का निवासी हूं। मेरी रचनाएं जो रोचक कविता , काव्यानुवाद , गीत , व्यंग , लेख , कोटेशन इत्यादि भिन्न भिन्न विषयों पर है आप यहां पढ़कर उसका आनंद उठा सकते हैं। I am engineer , researcher and writer. I live at village Roari , via - Lauria, District- champaran, Bihar, India. Blog url -Pashupati57.blogspot.com , Contact-- Er. Pashupatinath prasad , E-mail- er.pashupati57@gmail.com , Mobile 6201400759
गुरुवार, 23 जून 2022
विचार ( भाग 13 )
मंगलवार, 21 जून 2022
विचार ( भाग 12 )
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| अनुसंधानशाला से विचार भाग 12 प्रस्तुत करते इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद |
कोटेशन
विचार ( भाग 12 )
रचनाकार - इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद
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** समझना से समझाना कठिन होता है। ** ** साहित्य का महत्व दो तरह से आंका जाता है। ** अनुश्वार (• ) और चंद्र बिंदु की उत्पत्ति संभवत: चांद और तारा देखकर हुयी है। ** ** अधिकांश कार्य दो प्रकार से पूरे किए जाते हैं - ** जाति नाम , धर्म और भेष बदलकर बदली जा सकती है। ** ** समाज ईश्वर का एक ब्रांच औफिस है। और व्यक्ति इसका एजेंट। ** ** कलम का काम देखने में बहुत आसान , पर करने में भीषण कठिन है। जबकि कुदाल का काम देखने में भीषण कठिन , पर करने में आसान है। ** ** विकास और विनाश समय पर सीधे निर्भर करता है। ** ** नवीनता के लिए परिवर्तन आवश्यक है । और परिवर्तन के लिए नवीनता आवश्यक है। ** ** सफलता के लिए अपने सामर्थ्य अनुसार लक्ष्य निर्धारित करना जरूरी है। और निर्धारित समय में उसे पूरा करना भी जरूरी है। ** ** जो शिकारी जिस तीर से शेर मारने की तमन्ना रखता है उससे गीदड़ भी नहीं मरे तो या तो शिकारी अनाड़ी है या गीदड़ चमत्कारी। ** ** किसी तथ्य की सत्यता निम्न प्रकार से की जाती है। ** मानव संसार मुख्यत: तीन कर्मों में ही रत है। ** कोई जिधर घृणा करता उधर पीठ और जिधर भय देखता उधर मुंह रखता है। इसी प्रकार सोने में जिधर निर्भयता है उधर सिर और जिधर भय है उधर पैर रखता है। ** भारत में अराजकता के अनेक कारणों में से एक कारण यह है कि आजादी के बाद ग्रामीण प्रशासन जो पंचों द्वारा संचालित होता था धीरे धीरे शून्य होता गया। ** प्रकाश ( चेतन ) और अंधकार ( जड़ ) इन दो से ब्रह्मांड निर्मित है। इन दोनों का मूल तम है। ** ** मानव के पूरे जीवन में तीन ही साथी और संरक्षण बनते। ** ब्रह्मांड में कोई भी रेखा परम सरल रेखा ( absolute straight line ) नहीं है। अर्थात शून्य डिग्री का वक्र। परम सरल रेखा भी नहीं खींचा जा सकता है।** ** तम क्या है ? ** आकाश कैसे बना है ? ** सत्य प्रमाणित निम्न प्रकार से किया जाता है। ** मेरे विचार में मन , आत्मा , प्राण , ब्रह्म, परमात्मा की परिभाषा निम्न हैं। मन - पांच ज्ञानेंद्रियां नाक , कान, आंख , त्वचा एवं जीभ द्वारा निर्मित एक विशेष तरंग को मन कहते हैं। उपरोक्त सब मेरा अपना सोच और विचार है। इस पर आप सब अपना विचार और प्रतिक्रिया से अवगत कराएं तो आभारी रहूंगा। ********** क्रमशः ********************** My blog URL ********* ************ ******** |
सोमवार, 20 जून 2022
विचार ( भाग 11 )
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| अनुसंधानशाला से विचार भाग 11 प्रस्तुत करते इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद |
कोटेशन
विचार ( भाग 11 )
रचनाकार - इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद
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** मूर्ख का यह गुण होता है कि अपनी प्रगति के लिए सदा शून्य से गुणा करता है और अनंत से विभाजित । नतीजा शून्य का शून्य। ** व्यक्ति की अमरता में नाम , यश और धन का योगदान अहम होता है । ** ** अगर मन कर्म करना न चाहे , काम से मन जी चुराए , यह भी न समझ आए कि क्या करें या न करें , तो ऐसे समय में सभी कार्यों की एक सूची बना लें और जो सबसे आसान और रूचिकर कार्य हो उसे पहले शुरू करें । इसी तरह और कार्यों को करते जाएं। जो सबसे कठीन है उसे सबसे बाद में। ** अविद्या विद्या के मार्ग में सदा रुकावट पैदा करती है। यह डरती है तो सिर्फ दो से - ** विकास - इसमें पहले नाम , तब धन और अंत में यश मिलता है। ** पूर्व संस्कार , वर्तमान संस्कार और परिवेश मन और चरित्र का निर्माण करते हैं। ** ** अगर प्रकाश स्रोत पृथ्वी से बाहर अर्थात सूर्य , तारा इत्यादि पर लिया जाए तो इससे पृथ्वी पर बनी छाया अनित्य ( variable ) होती है। ** किसी एक समान गति से गमन करता हुआ पिंड A पर स्थित गति करता हुआ पिंड B की गति पर पिंड A की गति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। ** दो देशों के युद्ध में दोनों का संविधान कठोर रूप से सक्रिय हो जाता है , लेकिन गृह युद्ध की स्थिति में उल्टी होती , क्योंकि गृह युद्ध संविधान की शिथिलता के कारण ही होता है। ** ** राजद्रोह - जो व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए लड़ा जाए। ** समाज की रचना और संचालन समझौता के सिद्धांत के कारण है। ** ** वह कर्म बढ़िया और अच्छा कर्म कहलाता जो दूसरे कर्म में सहयोग दे और सफल बनाए। जो असहयोग करे और असफल बनाए वह घटिया कर्म है। ** ** एक ही कर्म एक के लिए बढ़िया तो दूसरे के लिए घटिया हो सकता है। एक समय में बढ़िया तो दूसरे समय में घटिया हो सकता है वगैरह। ** ** कोई भी व्यक्ति किसी की मृत्यु का कारण हो सकता है कर्त्ता नहीं। लेकिन अपनी मृत्यु और जीवन का कर्त्ता हो सकता है। ** ** आचार्य भास्कर के अनुसार शून्य को शून्य से विभाजित करने पर परिणाम अनंत होता है। ** ** चाहें किसी विधि से मिली सफलता सुखदाई होती , जबकि असफलता दुखदाई। ** ** धन का आगमन असंतोष पैदा करता है । और धन का गमन संतोष करने पर बाध्य करता है । ए धन का नित्य गुण हैं। ** ** सज्ञ - किसी चीज का पूर्ण ज्ञान ** जीत के लिए निम्न शक्तियों की आवश्यकता होती है - ** ब्रह्मांड में कोई ऐसा चीज नहीं जो बिना छिद्र ( void ) का हो। प्रकाश में भी छिद्र है । एक ही चीज जिसमें छिद्र नहीं है वह है तम । यानी शून्य छिद्र ( zero void ) । ** ** जब मनुष्य शरीर धारण कर लेता है तो बिना कर्म नहीं रह सकता है। प्रत्येक शरीरधारी जीव को कर्म करना ही पड़ता , चाहे वह सुकर्म हो अथवा कुकर्म। सभी कर्म का दो ही लक्ष्य है। मन की तृप्ति या पेट की तृप्ति। ** मूर्ख और दुर्जन का तीन अनियंत्रित होता है । ** यदि कोई बिंदु किसी बिंदु के सापेक्ष स्थान न बदले तो उसे स्थिर बिंदु कहते हैं। ** भय का कारण भ्रम है । भय का निदान ज्ञान , बुद्धि , तर्क तथा अध्ययन है। ** ** अर्थव्यवस्था तीन प यानी प्रकृति , परिवेश और परिवर्तन पर निर्भर है। ** ** पागल कोई समाजिक कार्य नहीं कर सकता है। यदि कोई समाजिक कार्य करता है तो वह पागल नहीं है। ** अगर किसी देश में वहां की प्रजा 100 रुपए की लागत से 1000 रुपए की उत्पादन करती है। तथा 5000 रुपए लगाकर 4000 रुपए की । ** जब अच्छा और बुरा में फर्क नही पता चले तो या तो वह ईश्वरत्व की ओर झुक रहा या पागलपन की ओर। ** ** महात्वाकांक्षा अच्छी बात है। बिना इसके कोई सफल नहीं हो सकता , परंतु अति महत्वाकांक्षा विनाशकारी है। सफलता की जगह विनाश दायक है। ** ************ क्रमशः ****************** इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद My blog URL ******** ***** ********** |
गुरुवार, 16 जून 2022
विचार ( भाग 10 )
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| अनुसंधानशाला से इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद विचार भाग 10 प्रस्तुत करते हुए |
कोटेशन
विचार ( भाग 10 )
रचनाकार - इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद
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** आम आदमी सिर्फ बीता कल अर्थात भूत की बातें सोचता है और जीता है । मध्यम पुरुष बीता कल यानी भूत की बातें सोचता है परंतु भविष्य में जीता है । परंतु उत्तम व्यक्ति , दूरदर्शी पुरुष भूत वर्तमान और भविष्य तीनों देखता है और सोचता है तथा वर्तमान में जीता है। ** ** वर्तमान भूत का अंत और भविष्य का प्रारंभ है। 0.0000.....1 सेकेंड में भूत वर्तमान में और वर्तमान भविष्य में बदल जाता है। भूत पर सोचा जा सकता है , भविष्य पर विचार किया जा सकता है , लेकिन वर्तमान कर्म करने के लिए है । अगर यह समय गंवा दिए तो फिर नहीं आने का। ** ** प्रकोष्ठ यानी रूम तथा पोशाक को अस्त व्यस्त रहना मानसिक परेशानी का द्योतक है । और ऐसा व्यक्ति या तो जाहिल है अथवा पहुंचा हुआ । ** ** किसी भी व्यक्ति को परास्त करने का दो ही अचूक तरीका है । यदि साधन हीन या असमर्थ हों तो अपनी महत्वाकांक्षा को घटाएं । यदि प्रभावशाली और साधन युक्त हों तो इसका प्रयोग कर उसके समानांतर व्यवस्था कायम करें । ** ** पौराणिक मतानुसार आत्मा मृत्यु के बाद निम्न गति को पाती है । ** हां कह कर धोखा देने से ना कह कर धोखा नहीं देना बेहतर होता है । ** ** वह कर्म जिससे बढ़िया से पूर्ण होने पर भी धन लाभ नहीं होता वह कर्म त्याज्य है। दूसरे शब्दों में अपने आप त्याज्य हो जाता है । ** मृत्यु के बाद आत्मा की स्थिति सपने जैसी रहती है । ** **आत्मा बेहद सूक्ष्म तरंग उर्जा है । जिसका वेग प्रकाश वेग से ज्यादा होता है । ** ** प्रत्येक व्यक्ति इसी आशा में जिंदा है कि मेरा अभीष्ट लक्ष्य , कार्य अब पूरा ही होने वाला है । यह उम्मीद उसे मृत्यु तक लगी रहती है । ** ** प्रत्येक व्यक्ति चाहे गुणी हो या अवगुणी यही अभिलाषा होती है कि मेरे गुणों की प्रशंसा दुनिया करे , लेकिन दुनिया आदिकाल से गुणों की प्रशंसा करती है तथा अवगुणों को त्याग करती है। ** ** विद्या और बुद्धि एक नहीं तथा ज्ञान भी इन दोनों से अलग है । एक अनपढ़ व्यक्ति भी बुद्धिमान हो सकता है , जैसे- अकबर । विद्या युक्त व्यक्ति भी मूर्ख हो सकता है , जैसे- एम ए पास मूर्ख । लेकिन ज्ञानी हमेशा बुद्धिमान और विद्वान ही होगा , क्योंकि ज्ञान विद्या , बुद्धि की संयुक्त देन है । ** ** बुद्धि ईश्वरीय है अर्थात प्रभु निर्मित । तथा विद्या किताब , गुरु द्वारा दिया गया ज्ञान है यानी मानव निर्मित । ** ** किसी में परम लगा देने का मतलब है अनंत , जैसे- परम शक्ति , परम ब्रह्म , परम पिता इत्यादि। और अनंत सिर्फ एक ही है , अत: परम लगा देने से सभी एक ही का बोध कराता है , अर्थात अनंत का।** ** मलाह जैसे जाल से मछली छापता है , वैसे ही विज्ञ ब्रह्मांड से विचार । ** ** जैसे हवा की गति की दिशा के अनुकूल खर-पात़ और धूल इत्यादि घूमता रहता है , वैसे ही मूर्ख , गवांर चतुर के इशारे पर घूमते रहते हैं ।** ** सत्य क्या है ? ** स्वाद का आरंभ बिंदु जहर है यानी हलाहल तथा अंत बिंदु अमृत है। अर्थात जहर का स्वाद को शून्य माना जाए तो अमृत का स्वाद अनंत । तथा और सभी स्वाद इनके बीच में। ** ** यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए तो महाभारत युद्ध का मूल द्रौपदी थी और विजय भी द्रौपदी ।** ** स्त्री पुरुष के बल , सफलता और उत्साह का मूल है । ए जैसी होगी व्यक्ति, घर ,समाज और देश वैसा होगा । **** ** अगर स्वतंत्रता का मतलब अनुशासनहीनता है तो उससे अच्छा परतंत्रता है । ** ** सबसे बड़ा साधु - जो दुष्ट के साथ दुष्टता करे। सबसे बड़ा दुष्ट - जो साधु के साथ दुष्टता करे और दुष्ट के साथ साधुता।** ** कर्म फल कारण नहीं देखता । कर्म चाहे जिस कारण उचित या अनुचित के कारण पूरा नहीं हुआ हो तो फल पर प्रभाव डालता ही है , जैसे यदि एक मेधावी छात्र पैसे की कमी के कारण से किताब नहीं खरीद सकता , जिससे उसकी परीक्षा की तैयारी नहीं हो पाती , जबकि वह निर्दोष है फिर भी वह अनुत्तीर्ण होगा । यह सिद्ध करता है कि कर्म फल कारण नहीं देखता।** ** कर्म फल कर्म की पूर्ति चाहता है । कर्म जब तक पूर्ण नहीं होगा तब तक उसका फल नहीं मिलता है। ** ** कर्म का सफल फल ही प्रसन्नता , श्रेष्ठता एवं समृद्धि है । तथा असफल फल कुंठा , दरिद्रता एवं लघुता है। ** ** उचित पूर्ण कर्म का उचित फल, उचित अपूर्ण कर्म का अपूर्ण फल , तथा अनुचित पूर्ण या अपूर्ण कर्म का कुछ फल नहीं मिलता है ।** ** प्रश्न - भ्रम क्या है ? ** सूर्य प्रकाश में आंख से दृष्टिगत घटना और कान से सुनी ध्वनि विश्वसनीय होते हैं अन्यथा संदेहास्पद। ** ** जीवन में कर्म बदल जाए और क्रिया नहीं बदला जाए या क्रिया बदल जाए और कर्म नहीं बदला जाए तो वह सफलता नहीं मिलती।** ** नौकरी वस्तुत: चाकरी है। नौकरी करने का मतलब है परतंत्र होना । ** सभी काल में सब कोई प्रायः यही कहता है कि मेरे पूर्वज का समय का जीवन सुखमय था । और अब जमाना बदल गया। अब क्या जमाना आ गया ।और पहले कितना अच्छा जमाना था। इसका मूल कारण यह कि यह है कि सुनी बातें मनभावन होती तथा दूसरा कारण अतीत प्यारा होता है और वर्तमान कठोर क्योंकि यह प्रत्यक्ष होता और परिश्रम करना पड़ता वगैरह । ** ************** क्रमशः ***************** इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद My blog URL ********* ******* ****** |
बुधवार, 15 जून 2022
विचार ( भाग 9 )
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| अनुसंधानशाला से विचार भाग 9 प्रस्तुत करते हुए इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद |
कोटेशन
विचार ( भाग 9 )
रचनाकार - इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद
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** सुख के दिनों में दुख का दिन भूल जाता है । अगर यदा-कदा याद भी आता है तो मधुर स्मृति बनकर और इससे मनोरंजन होता है । ** जैसे ध्रुव पर जाकर सभी देशांतर रेखाएं अपना कोण और दिशा खोकर एक बिंदु में परिवर्तित हो जाता है , वैसे ही ज्ञान की एक खास सीमा पार करने के बाद व्यक्ति को जीवों में अंतर नहीं दिखता । ** ** दुर्योधनो को एक से एक मारक कुबुद्धि एवं कुकर्म होता है । और कृष्णो को एक से एक सुबुद्धि एवं सुकर्म । ** शरीर में कंपन भय से भी होता है , और क्रोध से भी । भय से उत्पन्न कंपन शिथिलता एवं कुंठा उत्पन्न कर नाश करता है । इसके विपरीत क्रोध से उत्पन्न कंपन गतिशीलता , उग्रता एवं गुप्त बुद्धि पैदा कर करो या मरो को चरितार्थ करता है ** ** कोई भी सिद्धि या सफलता तीन मूल बातों पर निर्भर करती है। प्रथम योजना , दूसरा कर्म ( प्रयास ) और तीसरा धन ** ** पूर्ण ज्ञान या विद्या निम्न प्रकार से अर्जित होता है। ** निर्धारित समय में निर्धारित कार्य को पूरा करने वाला व्यक्ति को सफल पुरुष कहते हैं ,और फल को सफलता । ** ** भीड़ जिसको आंखें होती है , पर दिखता नहीं । कान होता है ,पर सुनता नहीं । मस्तिष्क होता है एक नहीं अनेक , पर सभी में गोबर भरा होता है , समझता नहीं। और आश्चर्य की बात यह है कि इसको मुंह नहीं होता , लेकिन आवाजें अनेक होती है , सभी अल्प आयु और अलग-अलग । और इसका रूप एवं आकार हर देश के हर कोने और हर काल में एक सा ही होता है, तनिक सा भी फर्क नहीं होता। ** ** किसी खास समय एवं खास स्थान पर सभी प्रकार की ऊर्जाओं की आवृत्तियों के कुल योग को प्रकृति कहते हैं ।** ** सफल , योग्य एवं सच्चा वैज्ञानिक नहीं किसी घटना या बात से इंकार करता है , और नहीं उसे आंख मूंद कर स्वीकार। इन्कार इसलिए नहीं करता कि कुछ भी संभव है । और स्वीकार तब तक नहीं करता जब तक वह तर्क ,जांच एवं प्रयोग पर खरा नहीं उतर जाए। ** तीव्र से तीव्र धावक चाहे वह पृथ्वी की परिक्रमा कुछ ही क्षण में पूर्ण करेने की क्षमता क्यों नहीं रखता हो यदि खेल के नियम के विपरीत दिशा में दौड़े तो एक साधारण धावक से भी पार नहीं पा सकता। वह लक्ष्य से दूर होता जाएगा। जबकि वह वास्तविक दृष्टिकोण से योग्य धावक है , लेकिन वैधानिक दृष्टिकोण से असफल धावक । उस व्यक्ति का भी यही हाल होता है जो योग्य होते हुए भी सामाजिक , नैतिक एवं वैधानिक नियम नहीं पालन करते यानी उल्टा चलते हैं। ** ** परम मित्र एवं घोर शत्रु : - ** अलग या अलगाव :- ** मित्रता का भेद या प्रकार : - ** अगर मेजबान अपने मेहमान के साथ वैसा ही स्वागत नहीं करता जैसा खुद वह मेहमान बनने पर चाहता है तो वह योग्य मेजबान नहीं । ** सबसे बड़ी मूर्खता मूर्खों के बीच चतुर बनना। सबसे बड़ी चतुराई मूर्खों के बीच मूर्ख बनना । ** ** ईश्वर एक ऐसी पूर्ण आस्था जो माता-पिता , पति-पत्नी , पुत्र-पुत्री , भाई-बहन और बंधु-बांधव की आस्था से भी ज्यादा विश्वासनीय होती है ।** ** खुशी कलह का व्युत्क्रमानुपाती होता है तथा शांति के समानुपाती । इसी प्रकार दुख कलह का समानुपाती होता है , तथा शांति के व्युत्क्रमानुपाती। ** समानता का सिद्धांत ( Theory of similarity ) - ** शतरंज की चाल निम्नलिखित चार मूल सिद्धांतों पर आधारित है। ** समतुल्य विचार ( Thought equivalent )- ** अगर प्रचार द्वारा झूठ को भी मान्यता मिल जाए तो वह भी सत्य सा प्रतीत होता है। और कालांतर में सत्य हो जाता है , लेकिन इसकी उम्र दीर्घायु नहीं होती । ** ** आश्चर्य : - ब्रह्मांड की प्रथम घटना , वस्तु एवं कार्य को आश्चर्य करते हैं । ** ** वैज्ञानिक एवं साहित्यिक में अंतर यह है कि प्रथम ताड़ को तिल बनाता है , और दूजा तिल को ताड़ ।** ** शून्य जोड़ने से कुछ नहीं मिलता , लेकिन अनंत जोड़ने पर अनंत मिलता। ** ** परम सरल रेखा होकर जो जहां से चलता है अनंत समय के बाद वहीं पहुंचता है ** ** प्रकृति या तो नाश करती है अथवा विकास , विराम में कदापि नहीं रहती ** ** अतीत सदा सुहावन , वर्तमान कभी मनभावन तो कभी अपावन और भविष्य सदा लुभावन होता है । ** ** प्रश्न - ईश्वर क्या है ? ** संबंध दो प्रकार का होता है । ** ईश्वर की परिकल्पना प्राया लोग ऊपर ही क्यों मानते हैं ? क्योंकि ऊपर सहज दृश्य है , और नीचे सहज अदृश्य। ** ** लेन-देन निम्न ही तरह से किया जाता है , अर्थात इसका निम्न नाम है । **************** क्रमशः **************** इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद My blog URL ******** ******** ********* |
रविवार, 12 जून 2022
चाणक्य नीति काव्यानुवाद , अध्याय 14
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| महर्षि चाणक्य |
कविता
चाणक्य नीति काव्यानुवाद
अध्याय 14
रचनाकार - इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद
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तीन रत्न है इस धारा पर , आत्मा के अपराध वृक्ष से , भार्या , मित्र , धन व धारा , बहुजन निर्बल जन मिलकर नाशे शत्रु प्रबल को , जल में तेल नहीं पचता है , धर्म की चर्चा को सुनने पर, कर्म कुफल मिलने पर पछताए जन जैसा , तप में , दान में और विज्ञान में , दूर न दूरी करती उसको , लाभ की इच्छा रखते जिससे , राजा ,अग्नि ,गुरु व नारी , अग्नि ,जल , सर्प , मूढ़ , नारी , उत्तम जीवन है गुणी का , केवल एक कर्म से जग को , अवसर के अनुकूल बोले जो वाक्य हमेशा , एक ही देह भिन्न दृष्टि से , 6 बातों को सदा छिपाएं , कोयल दिन बिताती मौन होकर के तब तक , धर्म , धन धान्य व वचन गुरु का, तज खल संगति , रह साधु संग , ( नोट : - पूरा चाणक्य नीति काव्यानुवाद पढ़ने के लिए वाट्सएप 919351904104 पर संपर्क करें। या http://Www.nayigoonj.com पर क्लिक करें। ) +++ समाप्त +++ इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद My blog URL ******* ******* |
शनिवार, 11 जून 2022
विचार ( भाग 8 )
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| अनुसंधानशाला से विचार भाग 8 प्रस्तुत करते हुए इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद कोटेशन ** चूहा पकड़ने वाला जैसे ही चूहा के बिल का मुख्य छिद्र खोदता है , उसमें असंख्य बिलों का जाल पाता है । कौन से बिल में चूहा है इसका निर्णय उसे नहीं हो पाता है । ** सभी स्वदेशी का प्रथम पूर्वज विदेशी ही हैं। जैसे -आर्य भी बाहर से ही आए हैं । अमेरिका के नागरिक भी बाहर से ही आए हैं वगैरह ।** ** अग्नि में फूंक मारने से प्रकाश मिलता है ,राख में फूंक मारने से कालिख । मूर्ख में फूंक मारने से कुबुद्धि और विद्वान में फूंक मारने से सुबुद्धि ।** ** मनुष्य को संकट काल में सफलता पाने के लिए कछुआ के गुणों का अनुसरण करना चाहिए , जैसे कछुआ संकट आने पर अपना गर्दन छुपाकर रक्षा कवच ओढ़ लेता है , वैसे ही सज्ञ को चाहिए कि अपना गर्दन संकटकाल में छुपा ले , तथा संकट छंटते ही कछुआ की गति से धीरे-धीरे परंतु दृढ़ता पूर्वक अपने लक्ष्य को प्राप्त करे। ** ** दूरी बढ़ने से आकर्षण बढ़ता जाता है , भावना तथा प्रेम भी प्रबल बनता जाता है , दुर्भावना , द्वेष मिटता जाता है। ** अगर कोई छात्र किसी से कुछ नहीं पूछता है तो या तो वह असाधारण और विलक्षण है , वह सब कुछ समझ जाता है । अथवा वह महामूर्ख , कुछ नहीं समझता और लज्जा वश पूछता भी नहीं।** ** मछेरा मछली पकड़ने के लिए अनेकों कांटा डालता है । किसी में छोटा , किसी में मन लायक तथा किसी में कुछ नहीं फंसता है , वैसा ही अवसर है । ** ** किसी देश , किसी घर और किसी व्यक्ति का बल उसकी औरतें हैं । उन्हीं में केंद्रित है उनका विकास या विनाश । ए जैसी होंगी विकास भी वैसा होगा। ** ** महत्वाकांक्षा की प्रचंड ज्वाला ही मन में अग्नि प्रज्वलित करती है , जो सर्वप्रथम मस्तक को भस्म करता है , तथा क्रोध में प्रज्वलित होता है । उसके बाद धीरे-धीरे मन और तन को भी खा जाता है ** ** जीवन में कभी एक ऐसा उदासीन बिंदु आता है जहां मां-बाप , पुत्र-पुत्री , पत्नी- मित्र , भाई- बंधु इत्यादि अपना नहीं लगता । इस हालत में सिर्फ एक ही मान्यता और आस्था पर विश्वास जमता है और वह है ईश्वर । यदि व्यक्ति इस मान्यता और आस्था का सहारा नहीं ले तो यह उदासीन बिंदु व्यक्ति को या तो पागल कर दे या तो मौत दे दे ।** ** तन का बल और कुछ दूसरा नहीं मन का ही बल है । इसलिए शेर हाथी को भी हरा देता है वगैरह।** ** यों तो धन का उपयोग हमेशा है , लेकिन इसकी उपयोगिता बुढ़ापा में सबसे ज्यादा है । ** ** यों तो माता पिता अपनी संतान को हमेशा अपने पास देखना चाहते हैं , लेकिन बुढापा में सबसे ज्यादा अपने नजदीक देखना चाहते हैं ।** ** ज्यादा काम करना ही खूबी नहीं है । खूबी है सफल कर्म करना अर्थात सफलता ।** ** जैसे किसी के पास बहुत सा शून्य हो तो भी वह संख्या नहीं बना सकता अगर उसके पास अंक नहीं हो । वैसे ही मूर्ख और दुष्ट के संग से कोई भी वृद्धि संभव नहीं। ** ** पूर्ण सफलता तीन बातों से परिभाषित होती है - नाम ,यश और अर्थ यानी धन। जिसमें ( आम परिस्थितियों में ) तीसरा काफी महत्वपूर्ण है । कहने का अर्थ यह है कि यदि व्यक्ति सफल हो और पैसा नहीं मिले तो उसका वह कार्य असफल तुल्य ही है । ** ** ओम मेरी नजरों में - ** न्याय , शिक्षा एवं प्रशासन सिर्फ यही तीन सुधर जाए तो वह देश उन्नति की चोटी पा जाए । अर्थात रामराज्य और आदर्श देश में उनकी गणना होने लगे । ** शाप और कुछ नहीं मन का विखंडन है , और मन का विखंडन और कुछ नहीं इलेक्ट्रॉन , प्रोटॉन इत्यादि से भी अति सूक्ष्म तत्त्वों का विखंडन है। और उससे उत्सर्जित ऊर्जा परमाणु बम से भी ज्यादा विनाशकारी होती है ** ** मन का विखंडन अर्थात अति सूक्ष्म तत्त्वों का विखंडन , जिसे मस्तिष्क रूपी कंप्यूटर से प्राचीन ऋषि करते थे , जिस पर प्राचीन आर्ष ग्रंथ प्रकाश डालता है । ** ** बार-बार पढ़ने के बाद भी जिस किताब या रचना का स्वाद अगर उसके प्रथम पाठन जैसा बना रहे , बल्कि बढ़ता जाए तो वह उच्च कोटि का ग्रंथ या रचना कहलाता है । ** ** परंपरा अनुकरणीय होता है । जहां अनुकरणीय नहीं है वहां विद्रोह पैदा होता है । ** ** शाप और आशीर्वाद की परिपूर्णता दाता की आत्मा पर निर्भर करती है। यदि शत प्रतिशत शुद्ध आत्मा से शाप या आशीर्वाद दिया जाए तो शत-प्रतिशत फलित होगा । यदि त्रुटि युक्त आत्मा से दिया जाए तो पूर्ण फलित नहीं होगा । ** बिना किसी काम यानी कर्म रहित चुपचाप बैठा व्यक्ति तंद्रा में रहता है , अर्थात या तो चिंता में अथवा चिंतन में । यदि मन शांत है तो चिंतन में , यदि मन अशांत है तो चिंता में । और दोनों ही तंद्रा की अवस्था है । ** छोटी अवधि तंद्रा स्वाभाविक प्रक्रिया है। परंतु बड़ी अवधि तंद्रा आम आदमी के लिए अस्वभाविक प्रक्रिया है , परंतु योगी , ज्ञानी और वैज्ञानिकों के लिए स्वाभाविक प्रक्रिया । ************* ******** ****** इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद My blog URL ******** ******* **** ****** |
शुक्रवार, 10 जून 2022
हठ , स्वाभिमानी बनो , नेपाल ( तीन गीत )
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| अनुसंधानशाला से तीन गीत प्रस्तुत करते हुए इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद |
गीत
शीर्षक - हठ , स्वाभिमानी बनो और नेपाल ( तीन गीत )
रचनाकार - इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद
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हठ हठ कैकई के कारण से दशरथ मरे , हठ कारण से लंका रसातल हुई , छोड़ो हठ अभिमान व गुमान प्रियतम, कहे पशुपतिनाथ , हठ करता है नाश , ******* स्वाभिमान बनो मुंह से अमृत की वाणी हमेशा बोलो , काल की कड़कड़ाहट से डरना ना तू , करो कर्म ऐसा सुहावन प्यारा , वह बनो ज्वाला जल जाए बत्ती , पढ़ो लिखो सभी कि हटे मूर्खता , *********** नेपाल सुन सुन सब नेपाली , हिमालय व तराई , मधेशी व पहाड़ी , घूमें गोरा गोरा गाल , लिखे पशुपतिनाथ , *********** ******** ************ इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद My blog URL ******* ********** |
गुरुवार, 9 जून 2022
कलम और कुदाल , अकेला तथा भय ( तीन कविताएं )
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| अनुसंधानशाला से तीन कविताएं प्रस्तुत करते इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद |
कविता
शीर्षक - कलम और कुदाल
रचनाकार - इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद
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व्यर्थ जाति रटता संसार , दो हेतु रत जीव व जन , कठिन प्रश्न यह श्रेष्ठ है कौन , गुरु हमेशा श्रेष्ठ कहाता , नर-मादा के मन जब डोले , दोनों मिल एक हो जाते , मन के कारण बनता पेट , जब-जब कोई कलम उठाए , व्यर्थ जाति रटता संसार , ******* ********** कविता जहां दुष्टों का मेला है , हर ढंग जहां अलबेला है , जहां पे नहीं कोई चेला है , जहां सब कुछ अलबेला है , ****** ********* कविता भय की महिमा बहुत अपार है , भय कारण से ही नर मानव है , भय कारण ही टिका समाज है , जीव एक दूसरा से भय खाता , ********* ******** इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद My blog URL *********** ******** |
बुधवार, 8 जून 2022
शून्य , एक और अनंत तथा तम और आकाश
शोध कविता
शीर्षक - शून्य , एक और अनंत तथा तम और आकाश
रचनाकार - इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद
शून्य , एक और अनंत
पूर्ण पूर्ण में दिया रहा फिर भी पूर्णांक ,
पूर्ण पूर्ण से लिया रहा फिर भी पूर्णांक ,
गुणा पूर्ण में किया पूर्ण फिर भी पूर्णांक ,
पूर्ण विभाजित किया पूर्ण फिर भी पूर्णांक।
( अनंत + अनंत = अनंत , अनंत - अनंत = अनंत,
अनंत × अनंत = अनंत , अनंत ÷ अनंत = अनंत )
( देखें संदर्भ 2 )
शून्य शून्य में दिया रहा फिर भी शून्यांक ,
शून्य शून्य से लिया रहा फिर भी शून्यांक ,
गुणा शून्य में किया शून्य फिर भी शून्यांक ,
शून्य विभाजित किया शून्य आया पूर्णांक ।
( 0 + 0 = 0 , 0 - 0 = 0 , 0 × 0 = 0 , 0 ÷ 0 = अनंत )
शून्य बिना एक रहता निष्फल ,
बिना एक शून्य फले नहीं फल ,
शून्य आदि है , एक शुरू है ,
अंत अनंत से ब्रह्म बद्ध है ।
बंद वक्र पर सभी जगह से शून्य शुरू है ,
वहीं पर है एक अनंत बन अंत है पाता ,
अंक विद्या के सब गणित के जनक तीन ए ,
इन तीनों से ही गणित को सीखा जाता ।
( देखें संदर्भ - 1 )
अगर शून्य रहता है किसी अंक के पीछे ,
बढ़े जरा भी अंक नहीं रहता वह नीचे ,
अगर शून्य आता है किसी अंक के आगे ,
10 गतांक में वृद्धि हो भाग्य उसका जागे ।
( जैसे - 01 , 10 , 100 वगैरह )
यह वृद्धि धीरे धीरे बनता अनंत ,
घटते घटते शून्य बने कहे सब संत ,
शून्य और अनंत नहीं दो इसको मानें ,
इन दोनों का दो उद्भव नहीं इसको जानें ।
( देखें संदर्भ - 1 )
तम
जहां कहीं प्रकाश रोको वहां तम आ जाता ,
क्या है इसका वेग बोल तू क्या है पाता ?
अवलोकन बतलाता इसका वेग शून्य , अनंत ,
इस कारण से प्रकट हो जाता कहीं तुरंत ।
( वेग = विस्थापन/ समय , अगर समय शून्य तब वेग अनंत यानी शून्य समय में कहीं भी । अगर समय अनंत तब वेग शून्य यानी पूर्ण स्थिर )
इसका भौतिक गुण शून्य से है निरूपित ,
गति शून्य , आवृत्ति शून्य इसमें अपेक्षित ,
पांचवा मूल माप की परिभाषा देता तम ,
जिससे बद्ध यह वृहद प्रकृति चलती हरदम ।
( पांचवा मूल माप cycle )
सब कहते हैं ब्रह्म रचता है भू को सब को ,
तुम कहते हो तम रचता है ब्रह्म को सबको ,
तम क्या है यह प्रश्न हमारा ?
कहो क्या प्रमाण तुम्हारा ?
बिना स्रोत नहीं भू पर बहता निर्मल निर्झर ,
बिना स्रोत प्रकाश पूंज नहीं भू है पाती ,
बिना स्रोत भू पर छाया बन जाती कैसे ?
अंत: कोई है स्रोत जहां से बनके आती ?
यह स्रोत अनंत बिंदु तम ,
यह स्रोत शून्य बिंदु तम ,
यह स्रोत है अंत बिंदु तम ,
यह स्रोत है आदि बिंदु तम ।
शुभ्र दिन में जो नीला रंग दिखता ऊपर ,
घोर निशा में जो काला छाता इस भू पर ,
ज्योंहि दीप शिखा बुझता जो रंग है आता ,
यही तम का भिन्न रूप इस भू पर छाता।
कहता वेद सभी है ऐसा ,
मनुस्मृति साक्षी जैसा ,
उपनिषद भी कहता यही ,
फिर क्यों मानें ऐसा वैसा ।
( देखें संदर्भ )
आकाश
जनक यज्ञ में याज्ञवल्क्य से गार्गी ने पूछा-
भू किससे आच्छादित है यह आप बताएं ,
भू है जल से,जल वायु से,
वायु ऊपर नभ है आए,
नभ ऊपर गंधर्व लोक है,
सूर्य लोग इस ऊपर आए।
इसके ऊपर चंद्रलोक है ,
नक्षत्र लोग इस ऊपर छाए,
देवलोक इसके ऊपर है,
इंद्रलोक इस ऊपर आए ,
प्रजापति लोक इसके ऊपर,
ब्रह्मलोक सब ऊपर छाए ,
पुनः प्रश्न किया गार्गी ने
इसके ऊपर पुनः बताएं ।
प्रश्न कठिन था , उत्तर शेष था ,
ऋषि मन तब कुछ अकुलाया ,
आकुल मन तब क्रोध सृजन कर
गार्गी को था चुप कराया ।
इसके आगे मैं बतलाता ,
ब्रह्म के ऊपर तम है छाता ,
तम के ऊपर क्या है आता ,
सबसे ऊपर क्या है छाता।
बंद वक्र पर चलो जहां से
फिर कर आते पुनः वहां पे ,
ऐसा ही इस चक्र को जानें ,
सबसे ऊपर तम को मानें ।
( देखें संदर्भ -1 )
जो है सूक्ष्म जिससे जितना
वह ऊपर रहता है उतना ,
जो है स्थूल जिससे जितना
वह नीचे रहता है उतना ।
वैज्ञानिक हाईगन का इथर
भी लगता कुछ तम के ऐसा ,
माइचेलसन-मोरले प्रयोग से
सिद्ध नहीं हो पाता वैसा ।
मैं पाता प्रयोग गलत यह
क्योंकि स्रोत है धारा ही पर ,
नित्य बिंदु पाने के हेतु
लें स्रोत किसी ग्रह के ऊपर ।
विद्युत-चुंबकीय , गुरुत्वाकर्षण
क्षेत्र द्वय आकाश बनाते ,
इथर का अस्तित्व नहीं है ,
अल्बर्ट आइंस्टीन यह बतलाते ।
महाप्रलय के हो जाने पर
नभ का पिंड खत्म होते सारे ,
सूर्य चंद्र व ग्रह नक्षत्र सब
खत्म हो जाते हैं सब तारे ।
तो भी क्या उपरोक्त क्षेत्र द्वय
बच जाएंगे ,
उसके बाद आकाश कहां से
बन पाएंगे।
अतः तम है जनक सभी का ,
और सभी हैं दास इसी का ,
स्वत: जन्म ले , स्वत: मरण ले,
मित्र अमित्र यह नहीं किसी का ।
सभी जगह यह व्याप्त
नहीं कोई जगह है खाली ,
ग्रह ,नक्षत्र ,परमाणु हो
अथवा रवि लाली ।
भू ,चंद्र हो अथवा कोई
नभ का तारा ,
यही अनंत का रूप
जिसे है देखती धारा ।
स्वामी विवेकानंद कहते
अनंत नहीं हो सकता दो-तीन ,
अनंत एक है , एक ही रहता ,
बीते चाहे कितना ही दिन।
अगर कोई विद्वान नहीं
सहमत इन सबसे ,
कृपा करके वह अपना
विचार बताए ,
अपना तर्क और प्रमाण
ईमेल करके ,
मुझ नाचीज़ को अपनी
बातों से समझाए।
संदर्भ ( References ) :--
1.
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| अनंत और शून्य बंद वक्र पर एक ही जगह पर होता है। |
2. पुर्णमिद्; पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
( उपनिषद )
3. तम आसीत्तमसा गूढमग्रेअ्प्रकेतं संलिलं सर्वमा इदम।
तुच्छयेनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकम ।।
( ऋग्वेद , अ.8,अ.7,व.17 , ऋग्वेदादिभाष्य भूमिकापेज 85 , स्वामी दयानंद सरस्वती रचित )
4. आसीदिदं तमोभूतम प्रज्ञात्मललक्षणम्।
अप्रतक्र्यमविज्ञेयम् प्रसुप्तमिव सर्वत:।।
( मनुस्मृति अध्याय 1, श्लोक 5 )
5. अनेकाबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोअ्नन्तरूपम्।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप।
( गीता अध्याय 11, श्लोक 16 )
6. आर्यावर्त अखबार
( गार्गी याज्ञवल्क्य संवाद )
7. Ideas and opinions
( Einstein Albert )
8. Paper on Hinduism Chicago Address by Swami Vivekananda ( pp-25 )
*********** समाप्त ***************
इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद
रोआरी , प चंपारण , बिहार , भारत , पीन 845453
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मंगलवार, 7 जून 2022
विचार ( भाग 7 )
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| अनुसंधानशाला से विचार भाग 7 प्रस्तुत करते इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद |
कोटेशन
विचार ( भाग 7 )
रचनाकार - इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद
|
** जैसे नदी की प्रबल धारा को नाविक काट कर नौका को किनारा प्रदान कर देता है । परंतु हवा का प्रबल वेग को नहीं काट पाता और नौका मझधार में या तो डूब जाती है या भटक , उसी प्रकार यह जीवन नौका है । कुछ सज्ञ जानते हैं यह राह नाश और पतन की है , परंतु चाह कर भी नहीं छोड़ पाते , अपने को नहीं रोक पाते , लाचार हैं । ** मानव इसलिए सत्य नहीं बोलता क्योंकि वह सत्य को ढक कर उसका नाम सभ्यता और चतुराई रख दिया है। अतः कटु सत्य बोलने में कांप जाता है । जैसे कलम जब नंगी होती है तभी शब्द उगलती है , जब ढकी होती है तो वह पॉकेट में जाकर चुप रहती है । ** ** सौंदर्य - जो नेत्र प्रिय हो और मन में आकर्षण पैदा करे ** तार्किक दृष्टिकोण से तो नहीं कुछ सत्य है और नहीं असत्य है । क्योंकि सत्य और असत्य दोनों परब्रह्म का ही रूप है , यानी अनंत का अंश । ** रात्रि पृथ्वी की छाया है , तथा छाया तम का एक रूप और तम जिसमें आवृत्ति तथा समय शून्य हो । दूसरे शब्दों में प्रकाश और अंधकार का मिलन विंदू तम है। या बराबर बराबर प्रकाश और अंधकार मिलाने से जो प्राप्त होगा वह तम है। ** ** योग्यता युक्त अहं स्वाभिमान कहाता है , परंतु योग्यता रहित अहं अभिमान , शान , घमंड कहता है । प्रथम ऐश्वर्य, वैभव ,अमरता देता है । वहीं दूसरा खोखलापन , पाखंड और अंततः मायूसी। एक ऊपर ले जाता है , तो दूजा नीचे । एक उन्नत मार्ग है , तो दूसरा पतन का । ** ** स्वच्छ मुस्कुराहट तभी मानव मुखड़ा पर प्रकट हो सकती है जब उतने क्षण के लिए उसके अंदर किसी प्रकार का क्लेश , द्वेष, वैर और मैल की भावना ना हो , अथवा मुस्कुराहट आ ही नहीं सकती । ** मिट्टी से बना दलदल में फंसकर जीव का मात्र तन का ही नाश होता है , आत्मा और मन सुरक्षित रहते हैं , परंतु मैला से बने दलदलल में फंस कर तीनों का नाश होता है । मैला दूसरा कुछ नहीं दुरात्मा का कलापन है और जगत की माया । ** ** पृथ्वी का कुल धन नियत ( constant ) है । इस कारण एक तभी धनी होगा , जब दूसरा निर्धन हो। ठीक उसी प्रकार जैसे सूरज नहीं अस्त होता है और नहीं उदय । किसी एक जगह के लिए अस्त होता है तो दूसरे जगह के लिए उदय होता है। ** धन बुद्धि का समानुपाती है और निर्धनता बुद्धि का व्युत्क्रमानुपाती । ** ** लेन-देन का साथी यदि लाभ हो तो वह अविराम चलता रहता है , रुकता नहीं। यदि दुर्भाग्य से उसकी सहेली हानी बनी तो वह टूट कर बिखर जाता है । ** पूरब और पश्चिम सही माने में देखा जाए तो एक ही है । दो व्यक्तियों में आगे वाले के लिए पीछे वाला पश्चिम है तो पीछे वाले के लिए आगे वाला पूर्व वगैरह । ** ** चलने से रास्ता खत्म होता है और करने से काम और सतत प्रयास से सफलता । ** कुपात्र पहले अपनी तथा दूसरे की विद्या का नाश करता है , उसके बाद बुद्धि का , फिर धन का , उसके बाद जीवन का और सुपात्र ठीक इसके उल्टा वृद्धि करता है। ** विनाश में सबसे पहले विद्या का नाश होता , तब बुद्धि का , तब धन का , अंत में तन का । और विकास में इसके उल्टा। ** ** प्रकृति प्रदत्त शरीर का काम है मल विसर्जन तथा सभ्य का काम है इसकी सफाई । ** जीवन यापन के लिए काम ढूंढकर पाना मानव जीवन का सबसे जटिल एवं महत्वपूर्ण कार्य है।** ** आदमी जितना सिखाने में दिलचस्पी लेता है उतना सीखने में लेता तो पृथ्वी स्वर्ग बन जाए।** ** मूर्ख नहीं किसी का दोस्त होता और नहीं दुश्मन। मूर्ख का एक ही काम है और वह है विनाश। जबकि वह अपनी समझ से अपने हितैषी का उपकार ही करता है , लेकिन उसको उपकार और अपकार में अंतर नहीं दिखता , इसलिए वह बिनाश ही करता है अर्थात उसको उ और अ में अंतर नहीं दिखता , उसके लिए दोनों एक ही है । ** ** ज्ञान मूर्खता का व्युत्क्रमानुपाती होता है । ** ** अगर मूर्ख मूर्ख का नाश नहीं करें तो वह विद्वान का नाश करेगा , क्योंकि मूर्ख का कर्म है विनाश। ठीक उसी प्रकार जैसे कीड़ा अगर कीड़ा को नहीं खाए तो वह सभी उत्तम लकड़ी और फर्नीचर को ही खा जाएगा । ** ** मूर्ख और दुष्ट कलह में रहता है, कलह में जीता है , कलह ढूंढता है , और दूसरी जगह जाकर कलह बोता है तथा वहां से कलह ले आता है । ** समाज जब मूर्खता से लड़ता तब विकास करता है , तथा जब विद्वान से लड़ता है तब विनाश होता है । ** ** चक्षु से मात्र सीमित परिवेश दृष्टिकोण होता है , परंतु ज्ञान से असीमित परिवेश का दर्शन किया जा सकता है । ** ** किसी भी कलह का कारण जलन है ,और जलन का अनेक रूप है , इसलिए कलह का भी अनेक ढंग है । ** ** सभ्यता का मूल दर्शन है , जितना भी ज्ञान विज्ञान सत्य विद्याएं हैं उन सभी का जनक दर्शन ही है , और बुद्धि दर्शन की माता , मंथन दर्शन का जनक । ** समय सब कुछ का धीरे धीरे नाश कर देता है तथा महाप्रलय के बाद खुद नाश को पा तम में विलीन हो जाता है , और पुनः तम से जन्म पाता है । सिर्फ एक ही चीज का नाश नहीं होता और शाश्वत है , वह है तम । यह पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है , और हर जगह चाहे वो भू हो अथवा अंतरिक्ष या कहीं एक ही रूप है , और एक ही गुण है। इसी का भौतिक रूप अंधकार , छाया , कालापन , नीलापन इत्यादि है ।** ** कुपात्र अपने आप को सबसे चतुर समझता है , तथा अपनी कुपात्रता के कारण अपना समय खाता है , तथा अपनी मूर्खता रूपी चतुराई के फलस्वरूप सुपात्र का समय खाने में सदा सचेत रहता है , लेकिन समय जब उसको नाश का विशाल सागर उपस्थित कर चुका होता है तब उसे अपनी गलती का एहसास होता है । ** विचार पांच ज्ञानेंद्रियों आंख ( प्रकाश तरंग ) , कान ( ध्वनि तरंग ) , नाक (आणविक तत्त्व ) , त्वचा ( तापीय, विद्युतीय तरंग ) जीभ ( आण्विक तत्त्व ) द्वारा पैदा किया गया एक विशेष तरंग है जो मस्तक में पहुंचकर भाव पैदा करता है और शब्द आदि बनता है। ** मस्तिष्क से तौली बातें सबसे ज्यादा सत्य होती है , अर्थात सर्वोत्तम होती है , आंख से देखी बातें इससे थोड़ा कम सत्य और काम से सुनी बातें इससे भी कम । ** ** कटु सत्य 24 कैरेट सोना सा होता है ,सत्य 20 से 22 कैरेट सोना सा और अर्ध सत्य गिनी सा यानी 12 से 18 कैरेट सोना सा और असत्य गिलट सा। ** ** जो पूरे होश हवास में सर्वदा नंगा रहता है उसे परब्रह्म परमेश्वर कहते हैं । जो दाढ़ी मूंछ आने पर होश हवास में नंगा होता है उसे अवतार कहते हैं , जैसे महावीर । ** जो सिर्फ बात से सुधर जाए उसे सुपात्र , जो हल्का दंड से सुधर जाए वह पात्र और जो भारी दंड से भी सुधार नही पाए उसे कुपात्र कहते हैं। ** ** जहां दंड विधान शून्य हो जाता है वहां व्यक्ति व्यक्ति दुर्जन बनने लग जाता है। यहां तक कि सीधा , निरीह और सज्जन भी दुर्जन बनने लगते हैं ** ** छोटा से छोटा पेड़ भी तभी गिरता है जब उसका जड़ काटा जाता है । यदि जड़ को छोड़ उसके और दूसरे भाग को जन्म भर काटा जाए तो भी उसका अस्तित्व कायम रहता है । यही कुटनीति और राजनीति का सार है। ** ** विज्ञान कटु सत्य होता है और उसकी नीरसता से उत्पन्न गर्मी से राहत साहित्य की ठंडक प्रदान करती है , क्योंकि सत्य यथार्थ है इसलिए तीखा होता है , और कल्पना स्वप्न है इसलिए मधुर । ************* क्रमशः **************** इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद My blog URL |
सोमवार, 6 जून 2022
तू , वह और मैं
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| अनुसंधानशाला से " तू , वह और मैं " कविता प्रस्तुत करते हुए इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद |
कविता
शीर्षक - तू , वह और मैं
रचनाकार - इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद
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कविता का भावार्थ यह कि यदि कोई अपने लिए मैं है तो सामने वाले के लिए तू है और परोक्ष वाले के लिए वह है। यानी एक ही व्यक्ति भिन्न परिस्थितियों में तू, वह और मैं है।ए तीनों व्यक्ति के नहीं आत्मा का वोध कराते हैं जो सभी में है और ए तीनों भी सभी में हैं। अपना मन अग्नि रोक सदा , कालिमा राख की परत चढ़ा , जो समझ रहे हो वह न समझ , कालिमा राख का ढेर लगा जब तलक रहे भू चंद्र सूरज , मैं को न समझ जन भू जन सा उसको भी बता वह वह समझे , बढ़ता जा आगे कर्म के बल , बीती कल है सबने देखी , न सोच निरर्थक की बातें , सुनने की आदत को डालो , गर बैठोगे बिन कर्मों के **********समाप्त********** इंजीनियर पशुपतिनाथ प्रसाद My blog URL ***** ***** ****** |











